Poetry 1 min read 620.7K reads

bekhabar


...तेरे शहर में, मैं मुहाजिर था...मुहाजिर ही रहा,इन्तजार, इन्तजार ही रहा और सफर,सफर ही रहा,

वो मेरी खबर से बाखबर कब था,वो बेखबर था और बेखबर ही रहा....

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