चढ़ रहा हूँ शिढि धिरे धिरे अपने ख्वाब की और।
कभी पूछे थे तुमने उन सारे सवालो के जवाब की और।
लोग कहते हे की रौशनी हमेशा से सब को खुश करती आई हे।
मगर देखा नही हे किसी ने उस जलते चिराग को और।
हम किसको किस बात के लिए कोसें यारो।
हमे तो अपनों ने हो झोंक दिया जलती आग की और
यंहा कौन देखता हे उस पूनम के चाँद की चमक
यंहा तो सब पीछे पड़े हैं,उस एक छोटे से दाग की और।