लिखे थे वो ख़त जिनको 
आए फिर वो याद सभी 

काग़ज़ के कुछ पुर्ज़ों से 

जुड़े थे यूँ जज़्बात सभी

 

 

भीड़ बहुत है चारों ओर 
तन्हा मन घबराता है 

हाल-ए-दिल बस लिखते हैं 

अल्फ़ाज़ों में हैं राज़ सभी 

 

 

कितने मौसम यूँ बीते 

जैसे तुम दिख जाओ कहीं 

पलकों को यूँ मूँदें हैं 

ख़्वाबों में ही आओ कभी 

 

दरवाज़े की हर आहट पे 

आमद की तमन्ना रहती है 

पल भर को सामने पाने पर 

कह दूँ न कैसे बात सभी 

 

ऐसी भी क्या रंजिश है 

क्यूँ इतनी ये दूरी है 

फिर दूर चले ही जाने को 

आख़िर को चले ही आओ कभी

 

- रवि