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लिखे थे वो ख़त जिनको

लिखे थे वो ख़त जिनको 
आए फिर वो याद सभी 

काग़ज़ के कुछ पुर्ज़ों से 

जुड़े थे यूँ जज़्बात सभी

 

 

भीड़ बहुत है चारों ओर 
तन्हा मन घबराता है 

हाल-ए-दिल बस लिखते हैं 

अल्फ़ाज़ों में हैं राज़ सभी 

 

 

कितने मौसम यूँ बीते 

जैसे तुम दिख जाओ कहीं 

पलकों को यूँ मूँदें हैं 

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