(ये पंक्ति मेरे उन बंधुओ को समर्पित है, जो समाज में बढ़ते जाती, धर्म और वैचारिक नफ़रत से प्रभावित हो कर खुद को खो चुके है, और कुछ पल इस नफ़रत से ऊपर एक इंसान होने का आनंद ढूंढ़ रहे है।)
जमाने से लड़ते लड़ते,खुद को ही हार बैठे हैं।
कीचड़ से बचते बचाते,अब खुद कीचड़ उछाल बैठे हैं।
नफ़रत से लड़ाई मे, अब खुद ही नफ़रत बांट बैठे हैं।
ये हार , यू ही एक हार नहीं,
जमीर हार जाना, कोई मामूली नहीं।
क्या नाज़ होगा हमें हमारी विरासत का,जब इंसान होने तक का नाज़ गंवा बैठे है।
मगर ये हार का एहसास , एक उम्मीद है बाकी ,जब तक जिंदा है ये जमीर, दफना देना मुझे इस जमाने की भीड़ में ,जिस दिन सिर गुरूर चढ़ जाए मेरे,जिस दिन भूल जाऊ कि इंसान है भीतर मेरे।


