टूट जाना बिखर जाना,

फिर भी नहीं सुधरना। 


ये इश्क़ तो है एक बला ,फिरभी है इसको करना।  


दिल तो मानता ही नहीं है, 

इसे बार बार ही है मरना। 


काँटों की तो फिकर ही नहीं, 

ऐसी ही राहों से है इसे गुजरना। 


सुबह हो या शाम या हो दोपहर, 

भूल जाये उसको ऐसी कोई पहरना। 


खुद तो भेष औघड़ों सा कर लिया, पर भूलता ही नहीं है उनका सवरना।  


छूटेगी कब आदत मुहब्बत की, 

जिसे सांसो के संग ही है ठहरना। 


रविन्द्र राजदार / @RavindraRajdar


*चित्र - इंटनेट साभार