तन को खाकर तनख्वाह करूँ,

दिन रात को अपने स्याह करूँ। 

मै कामगार हूँ भूखा और नंगा,

हर दिन मै खुद का दाह करूँ। 


ना डूबूं ना किसी पार ही जाऊं,

बीच भवर में बस नाव चलाऊं। 

कितना खुद को मल्लाह करूँ ,

तन को खाकर तनख्वाह करूँ। 


ना जमा हुआ न जम पाता है,

जो मिले वो कम रह जाता है। 

ज़िंदा हूँ तो कहाँ चरागाह करूँ,

तन को खाकर तनख्वाह करूँ। 


ज़िंदा रहने के हैं शरत बहुत,

उठा के देखा हैं परत बहुत। 

कैसे बच्चे व उनका ब्याह करूँ ,

तन को खाकर तनख्वाह करूँ। 


- रविन्द्र राजदार /@RavindraRajdar


चित्र - इंटरनेट