न जबाब बदला है न सवाल बदला है,
बदलने को तो कई बार ये साल बदला है।
पिछले और इस बरष भी खस्ता हाल है,
साल बदलने से कहाँ हमारा हाल बदला है।
फूल और पत्त्ते तो टूट कर बिखर गए,
गौर से देखो कहाँ पर वो डाल बदला है।
उससे निकल कर नदियां समंदर हुईं,
कबसे खड़ा है कहाँ वो हिमाल बदला है।
सूरज चंदा वही है और जमी आसमा भी,
चक्कर लगाने का कहाँ बवाल बदला है।
इश्क वालों के हिस्से में होती है जुदाई,
चकवा चकवी का कहाँ मलाल बदला है।
राजा के बेटे ही बनते हैं फिर से राजा,
इतनी आसानी से कहाँ जलाल बदला है।
गरीबी जर्जर ही रखती है बुनियाद घर की ,
थोड़ा रंग लगाने से कहाँ वो दीवाल बदला है।
लेकिन खुश रहना सृजन को सोच लेना,
बदलेंगे सब कुछ चलो ये ख्याल बदला है।
-रविन्द्र राजदार


