शहर के शहर खाली हैं,
कोई इन्सां नहीं मिलता।
बहुत है बुत यहाँ लेकिन,
कोई जिन्दा नहीं मिलता।
बेशरमी शौक सबका है ,
कोई शर्मिंदा नहीं मिलता।
मुफ्लिश का जो सहारा हो,
कोई बंदा नहीं मिलता।
भला जिससे जहाँ का हो,
कोई धंधा नहीं मिलता।
लौट के फिर से जो आये,
कोई परिंदा नहीं मिलता।
सर रख के रोना हो तो हो,
कोई कन्धा नहीं मिलता।
शहर के शहर खाली हैं,
कोई इन्सां नहीं मिलता।
-रविन्द्र राजदार
*चित्र - इंटरनेट साभार


