नदी के जैसा बहता जीवन,

हवा के जैसा उड़ता जीवन। 

एक बार गया तो गया ही मानो,

जो गया कहां है मुड़ता जीवन। 


जो बचा है उसको जीना सिखो,

संघर्षों का खूब पसीना चीखो। 

न कोशो बचे को जाने के खातिर ,

कैसे जिओगे जब है कुढ़ता जीवन।


जाके देखो बगिया में है पतझर,

कुछ दिन में होंगे नवल खिलकर। 

नित रोज नए सपने देखो,

सपने होने से ही है गूढ़ता जीवन। 


मुस्कान सजाकर रहना होगा, 

दुःख को भी हसकर सहना होगा। 

कोई ना सुने व्यथितों की, 

व्यथिता में कहाँ है जुड़ता जीवन। 


- रविन्द्र राजदार / @RavindraRajdar


चित्र - इंटरनेट