न हिन्दू को ढूंढा न मुसलमान को ढूंढा,

जिससे भी मिला उसमे इंसान को ढूंढा। 


हमने कितने दशकों की सिख पाई है, 

सुख दुःख में खड़ा मिला वही तो भाई है। इंसानियत हो जिसमे उस भगवान को ढूंढा। 

न हिन्दू.............


काम आया मेरे उसकी जात से क्या करना,

जो था वो था उसकी औकात से क्या करना। 

हो सके जिसकी खातिरदारी ऐसे मेहमान को ढूंढा।

न हिन्दू...........

 

हम नहीं बटें हैं कभी हमे बाटता है कोई और, 

क्या है उनका मकसद क्या करते हो कभी गौर। 

हर बाटने वाले में बस एक धूर्त बेईमान को ढूंढा। 


न हिन्दू को ढूंढा न मुसलमान को ढूंढा,

जिससे भी मिला उसमे इंसान को ढूंढा। 


- रविन्द्र राजदार  /@RavindraRajdar


*चित्र - इंटरनेट साभार