अखरते रहे मुझमे तुम जब मै बिखर गया, 

आयी ऋतू बसंत की तब मै निखर गया। 


नए लोगों से दिल को लगा तो लिया हमने, 

देख के नयी हरियाली लगा मै संवर गया। 


तुम भी तो टूटे थे जब हम दोनों छूटे थे, 

सूखा चमन जो था वो फूलों से भर गया। 


चलती रहेगी ऋतूवों की पाबंदिया इश्क़ पे,

जो नया पत्ता था वो भी हर बार झर गया। 


मिसाल होंगे हम दोनों ही मिलन बिछडन के, 

ज़िंदा कौन रहता है जो भी था वो मर गया। 

-रविन्द्र राजदार