बेटा किसान का,

चला था सीखने प्रबंधन। 


थी हजारों बेड़ियाँ, 

थे धन के भी बहुत बंधन। 


बुद्ध नगरी से किया, 

शिवाजी राज का वो बंदन। 


माँ बाप का प्यार था,

था सर पर राम नाम चन्दन। 


भाई का जोश था,

था दोस्तों का जोशबर्धन। 


भोजपुरिआ जवान था, 

था बस हिंदी का राजनंदन। 


कोंपी को कोंपी कहना था, 

सीखा के यारों ने किया ज्ञानबर्धन। 


दिल तो बच्चा है सुना के,

किया था मैंने भी तो मनोरंजन। 


अब चाकरी शुरू है, 

और आ भी रहा है धन। 


कुछ छूटे तो कुछ बिछड़े,

यार ही हैं धन यार ही हैं तनमन। 


बधाइयाँ सबकी हैं मायने रखती, 

जन्मदिन पर हैं सबको दिल से अभिननंदन। 


 

- रविन्द्र राजदार