जमीं पे रहना सीखा ही नहीं ,

आसमाँ की ख्वाहिश कर बैठे। 

छोटा रहना सीखा ही नहीं,

बड़ा होने की नुमाइश कर बैठे।

 

आसमाँ तक तो पहुंचे ही नहीं,

और तो और जमीं भी छूट गयी। 

जितने हुए बड़े उतने मिले बड़े ,

और छोटों से भी डोरी टूट गयी। 


छूट गयी झोपड़ी महल क़े खातिर,

और ना महल मिला ना झोपड़ी। 

बंद कमरों में मने सारे ही त्यौहार,

क्या होली दिवाली क्या लोहड़ी।

  

है याद मुझे वो धोबी का वो श्वान,

ना घर का था ना ही वो रहा घाट का। 

वफादारी में बस वो रहा दौड़ में, 

जीवन बस उसका था वो रहा बाट का। 


रविन्द्र राजदार / @RavindraRajdar