हाथ भर के ही फासले थे दिखने दिखाने में,
क्यूँ पूरी उम्र लग गयी वही फासले मिटाने में।
जिस गगन में चाँद था,था उसी गगन में सूरज,
क्यूँ चाँद ना दिखा कभी सूरज के ठिकाने में।
दोनों दिलों में प्यार और त्याग का था परचम,
फिर उम्र क्यूँ गुजरी नफरत को आजमाने में।
थे तो मिलन के खातिर बेताब चकवा चकवी,
जाने क्यूँ पग रुके रहे किस किस बहाने में।
मोड़ पर दोनों नहीं मुड़े फिर भी वो थे जुड़े,
जाने किस बेबसी को वो लगे थे छुपाने में।
वो राधा या कृष्ण थे या थे वो जैसे सीता राम,
क्यूँ अधूरा इश्क़ रह गया मर्यादा निभाने में।
जो "राजदार" थे वो भी ये इश्क़ नहीं समझे,
कलम कागज हुयी गीली ये दास्ताँ बताने में।
- रविन्द्र राजदार / @RavindraRajdar
चित्र - इंटरनेट


