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हर घर दिवाली आती है

हर घर दिवाली आती है,

पर हर घर राम नहीं आते। 

उनकी दिवाली क्या दिवाली,

जो औरों के काम नहीं आते। 


कितनी कौशल्लायें रोती हैं,

कितने दशरथ बलिदान हुए। 

कितने राम अभी बनबासी,

कितने लक्ष्मण कुर्बान हुए। 


कोई राम शरहदिया-है कोई परदेशी,

सबके ही अवधी अंजाम नहीं आते। 


हर गांव की सरयू बिलखे है,

हर भरत की आँख फड़कती है। 

हर राम लौटना चाहे घर ,

पर मर्यादा की आंच धधकती है। 


अवध पूरी मम

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