हर घर दिवाली आती है,
पर हर घर राम नहीं आते।
उनकी दिवाली क्या दिवाली,
जो औरों के काम नहीं आते।
कितनी कौशल्लायें रोती हैं,
कितने दशरथ बलिदान हुए।
कितने राम अभी बनबासी,
कितने लक्ष्मण कुर्बान हुए।
कोई राम शरहदिया-है कोई परदेशी,
सबके ही अवधी अंजाम नहीं आते।
हर गांव की सरयू बिलखे है,
हर भरत की आँख फड़कती है।
हर राम लौटना चाहे घर ,
पर मर्यादा की आंच धधकती है।
अवध पूरी मम पूरी थे कहते
वो खुद ही निजग्राम नहीं आते।
एक और बरष बनवासी हम,
एक और दीप बिन अपनों के।
एक और परिक्षा अग्नी की,
और एक युद्ध फिर सपनो से।
दिवाली तब जब बिजय मिले,
युद्धों के पूर्ण बिराम नहीं आते।
हर घर दिवाली आती है...
-रविन्द्र राजदार / @RavindraRajdar
चित्र - इंटरनेट


