खलिश अब ये नहीं के,

वो हमसे खफा हैं। 

खलिश तो अब ये है के, 

हमे मनाना नहीं आता। 


निभाने की कोशिश तो,

हमने भी पुरजोर की। 

पर उनको थी गफलत,

हमें निभाना नहीं आता। 


बड़ा गुरुर था खुद पे, 

जब अपनों की सोहबत थी। 

ये चूर हुआ है जबसे तबसे, 

हमे अपनाना नहीं आता। 


चाहे मेरे जश्न में लाख ,

तालियां नवाजे ये ज़माना। 

लेकिन ग़ुरबत में बचाने,

हमे जमाना नहीं आता। 


बेमुराद सी निकली मेरी, 

सब ख्वाहिशें जग में। 

जब वो कह के निकले सपने, 

हमे सजाना नहीं आता। 


मुह्हबत आज भी है तुमसे, 

ऐ तिजारत करने वालों। 

बस अब ऐसे है के जैसे,

हमे दिखाना नहीं आता 


खलिश अब ये नहीं के,

वो हमसे खफा हैं। 

खलिश तो अब ये है के, 

हमे मनाना नहीं आता। 



- रविन्द्र राजदार / @OjhaRN


*चित्र - इंटरनेट साभार