कुछ साबित करने में,
लगा है अब जमाना।
कहीं तो पहुंचने में,
है खूब आना जाना।
हांसिल को छोड़ ढूंढे,
हरदम नया ठिकाना।
न जाने क्या तलाश है,
जो है यूँ मशरूफाना।
साबित के खातिर खुद ही,
खुद ही को क्यों भुलाना।
इतना भागम भाग क्यूँ है,
कभी अपनों में ठहर जा ना।
बेशबब बस खुश रहा करो,
यूँही जलता रहेगा जमाना।
जो है बस उसे ही संभाल लो,
उसी से रखो निभाना विभाना।
कुछ साबित करने में,
लगा है अब जमाना।
-रविन्द्र राजदार


