चलो कुछ दर्द समेटा जाये,
कुछ देर तो आँखे नम हों।
वो जीवन कैसा जीवन है,
जिस जीवन में न गम हो।
गम सुख का ही हिस्सा है,
बेहतर पलों का किस्सा है।
कुछ बात पुरानी की जाये,
जिन बातों में कुछ दम हो।
आंसू को छिपाये क्यूं जीना,
बातों को दबाये क्यूं जीना।
बंधी गठरी क्यूं न खुल जाये,
बंधे बंधे क्यूं भीतर बम हों।
क्यूं याद नहीं आता वो प्यार,
जिसको कहते थे तुम संसार।
याद उसी को कर के रोलो,
या चुप रहो जो कोई मरहम हो।
पत्थर पत्थर तुम पहांड हुए ,
बिन फल फूलों के झाड़ हुए।
अब हिलो फलो फूलो दौड़ो,
खुद पर ही क्यूं बेरहम हो।
- रविन्द्र राजदार / @RavindraRajdar
चित्र - इंटरनेट


