दर्द के रंग हजारों हैं,

कैसे कैसे ये आते हैं। 

कुछ दर्द तो आंसू देते हैं,

कुछ अंदर से तड़पाते हैं।

 

हो दर्द तब भी मुस्कुराना है,

दुनिया को नहीं दिखाना है। 

दुनिया वालों को बूझ चुके,

सबका ही अलग पैमाना है।

क्या करें चमन के फूल थे हम,

अब बिन माली मुरझाते हैं। 

दर्द के रंग............ 


अब मय शाकी है मयखाना है, 

दिल और कहीं क्यों लगाना है। 

दिल लगा लगा के ऊब चुके, 

अब दिल को नहीं दुखाना है। 

क्या करें नज़र जब वो आ जाएं,

दिल और मै आपस में लड़ जाते हैं। 

दर्द के रंग............


"राजदार" भी बड़ा दीवाना है,

हर दर्द को इसने जाना है। 

आँशु भी इसके सूख चुके,

अब इसको नहीं बहाना है। 

क्या करें दर्द के मौके पर,

ये बरबस ही बह जातें हैं। 

दर्द के रंग............


- रविन्द्र राजदार / @RavindraRajdar