रस बीर अगर हो कविता में,
हिल ही जाती दिवारें हैं|
"दिनकर" तो दिनकर ही थे,
कवी आज बहुत ही बिचारे हैं|
लिखते हैं पक्ष मजबूत देखकर,
सुख सत्ता की डगर निहारे हैं|
कोई न उनको पूछ रहा,
फिर भी वो पुंछ पसारे हैं|
है छुपा है तुझमे सिंघनाद,
लिखो तेरे अंदर जो दहाड़ें हैं|
- रविन्द्र #राजदार

