कितनी प्यारी कितनी मोहक, सुंदर मस्त पवन बहती है
सर-सर करती रहती हरदम, सुनो गौर से क्या कहती है
सुविधाओं की अंधाधुन में इसको तुम दूषित मत करना
प्राणवायु बनकर ये अपने सीने के अंदर रहती है

पेड़ पौधे और जीव जंतु, इससे ही जीवन पाते है
आपस में मिलकर ये ही तो, जल की बूँद बनाते है
पृथ्वी के ऊपर इसने, ओज़ोन परत को बनाया है
आज तलक जिसने हमको, UV किरणों से बचाया है
इंसानों की अनदेखी को भी ये हँसकर सहती है
प्राणवायु बनकर ये अपने सीने के अंदर रहती है

पंचतत्व से बना है तन, इससे बढ़कर कोई तत्व नहीं
जहाँ नहीं वायुमंडल वहाँ, जीवन का अस्तित्व नहीं
यदि वक्त के रहते हम अपनी, आदत से बाज़ न आएंगे
तो, अपनी विध्वंश कहानी के, खुद खलनायक कहलायेंगे
जीव मात्र के लिए वायु की सबसे ज्यादा महती है
प्राणवायु बनकर ये अपने सीने के अंदर रहती है

~Ravi