नहीं किसी से दुश्मनी और ना किसी का यार मैं
मस्त मलंग होकर रहता हूँ, अपने ही संसार में
क्यूँ पड़ना इन बेमतलब की, बातों में बेकार में
मस्त मलंग होकर रहता हूँ, अपने ही संसार में

माना हूँ थोड़ा बेफिकरा, पर असंवेदनशील नहीं
साफ नीयत है अपनी एकदम, कैरेक्टर में ढील नहीं
बस अपने जज़्बातों का, इजहार नहीं कर पाता हूँ
इश्क़, मोहब्बत, प्यार की बातों से थोड़ा घबराता हूँ
हूँ थोड़ा कमजोर खिलाड़ी, इस दिल के व्यापार में
मस्त मलंग होकर रहता हूँ, अपने ही संसार में

एक दफा, दो चार दफा ग़र, कोई असफल होता है
दुनियाँ वालों की नजरों में, वो सिक्का तो खोटा है
जो मुझको खोटा कहते हैं, ये उनका अंदाज़ा है
ऐसे सारे बुद्धजीवियों से, अपना भी वादा है
ये खोटा सिक्का भी चलेगा, इक दिन भरे बाज़ार में
मस्त मलंग होकर रहता हूँ, अपने ही संसार में

~Ravi