आशियाना बड़ा है तेरा ऐ इंसान, पर तेरे आशियाने में गुजारा ना हमारा है || हम पंछी है सूर्ख पत्तों और घास से बना आशियान हमारा है, ऊंची टहनियों पर लटककर भी हम खुद को महफूज़ पाते हैं|| इंट पत्थर से जोड़कर खड़ा किया किला तूने, लाख पहरों के बीच भी ना महफूज़ तेरा ये आशियाना है||
फिक्र क्या करेगा तू हम परिंदो का ऐ इंसान, 'पर' का पंखा झेलना तुझे खूब भाता है|| इंसान है थोड़ी इंसानियत बचा ले अपने कल के लिए, हमारा दाना तो सड़क पर भी है शाख पर भी...