वेदना को कैसे लिखूँ,
मापूँ कैसे द्रविता को,
तुम ही अबके अब साथी
तो क्या साथी रखूँ खुद को,
निकलती है पीड़ाएँ जो,
दर्द नही क्या आवाजों में,
खुलते भी नही अब तो,
आत्मा नही शायद दरवाजों में।
गिरती बारिश की बूंदे,
कानो तक तो आतीं है,
भींगी भींगी आवाजें,
क्या बाहर भी नही जाती है,
है कोई कलम क्या,
जिससे लिख दूं अब वेदनाएं सारी,
पढ़कर मुस्करा ही दो,
कुछ तो जरूरत ही सबको हमारी।
पूरी जोर दौड़ लगायी है,
मंजिल अभी भी उतनी ही दूर,
उर पलट तो दू एक बार ही बस,
भर लिया ऊपर तक पूरा भरपूर।
#ra1vi2
