ऐसे ही रात को 3 बजे नींद नही आ रही थी तो ये कविता लिखी, ऐसा लगा जैसे सब कुछ उड़ेल रख दिया है, उसके बाद बढ़िया नींद आयी।
कविता थोड़ी बड़ी है इसलिए सिर्फ एक भाग यहाँ पोस्ट किया है, अगर आपको अच्छी लगे, तो ही अगला भाग पोस्ट करूँगा। जरूर बताएं कैसी लगी आपको।
मैं भी थोड़ा बैठ जाऊँ क्या,
थोड़ा सा ही,
पर सीने पर किसी के,
मैं भी रख सर सो जाऊँ क्या,
हाथ दिया है सबको,
कभी रुका नही ,
बस चला ही हूँ,
तो अब मैं भी
हाथ पकड़ किसी का
रास्ते में खो जाऊँ क्या,
रख सीने पर सर किसी के,
मैं भी अब सो जाऊँ क्या,
इस कशमकश का
इलाज कुछ तो होता होगा,
रात भर पहरा देता जो,
वो भी कभी सोता होगा,
तो देखो, चढ़ रही उषा,
छायी लालिमा,
तो अब मैं भी
डूबता चांद हो जाऊँ क्या ?
रख सीने पर सर किसी के,
मैं भी अब सो जाऊँ क्या?
ऐसे ही रात को 3 बजे नींद नही आ रही थी तो ये कविता लिखी, ऐसा लगा जैसे सब कुछ उड़ेल रख दिया है, उसके बाद बढ़िया नींद आयी।
कविता थोड़ी बड़ी है इसलिए सिर्फ एक भाग यहाँ पोस्ट किया है, अगर आपको अच्छी लगे, तो ही अगला भाग पोस्ट करूँगा। जरूर बताएं कैसी लगी आपको।
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