रात्रि की ऋण की आयी पुकार है,
हंसी की रोती टंगी तस्वीर बीच बाजार है,
टूट के बिखर जाऊँ मैं सरेआम,
अब सबको इसी बात का इंतज़ार है|


रात्रि की ऋण की आयी पुकार है,
हंसी की रोती टंगी तस्वीर बीच बाजार है,
टूट के बिखर जाऊँ मैं सरेआम,
अब सबको इसी बात का इंतज़ार है|