लिख दूंगा अकेलापन यहाँ पर,

तो चीर जाएंगे एक एक शब्द,

लिख दूंगा अगर सारे दर्द,

आंखे नीची, धड़कने ऊची हो जाएंगी,

लिखता नही हूँ,

खुद ही पढ़ता हूँ,

पढ़ ले अगर कोई ,

जीने की इच्छा नही होगी शायद तब,

ऐसे चीर देगा मेरा अकेलापन अब।


दिखेगा नही यहाँ तक,

अंधेरा है तो गहराई बहुत है,

नजरे जाती भी नही है,

झूठ की खुशियों के नीचे,

दर्द की सच्चाई बहुत है,

लिख दूंगा ये सच्चाई यहाँ पर,

तो नींद उड़ जाएगी रातो की,

जानते नही भी होंगे,

तो उफान देखोगे तुम बातों की।


शिकायत नही है तुम सब से,

तुम सब बुद्धि के बड़े तेज हो,

अग्रसर मंजिल की ओर,

भावनाओं में निस्तेज हो,

बड़ी बड़ी बातें,

मंजिल की इमारते,

लिख दूंगा अगर वो मंजिल यहाँ पर,

तो भ्रम ही टूट जायेगा सारा,

सूरज सा धधकता आवरण,

बन के रह जायेगा ठंडा मृत तारा।


अलग हूँ मैं अकेला,

भगवान तुमने अपने बनाये,

मैंने अपना बनाया ही नही,

अब भक्ति भी किसकी की जाए,

एक एक भगवान,

एक एक उसके भक्त,

लिख दूंगा अगर वो भगवान यहाँ पर,

तो आडम्बर सारा दिख जाएगा,

सच्चाई सारी बाहर,

सारा अकेलापन ही मिट जाएगा,


जितने लोग डूबे भक्ति में,

शायद अकेलेपन के साथ

ये कवि भी मिट जाएगा,


बस इसलिए ये कलम चलती नही है,

कभी किसी से कुछ कहती नही है,

साथ सबके रहती, पर साथ रहती नही है,

लिखती है बहुत कुछ, पर लिखती दिखती नही है।




#ra1vi2