किससे कहाँ कैसे आवाज़ उठाऊँ मैं,भारी बारिश की बूंदों को पकड़,कमरे तक अब कैसे लाऊँ मैं,सारा रास्ता ही गोल गोल है,तो मंजिल तक खुद को कैसे पहुँचाऊँ मैं।