जगंल का पला पर बनाया धर्म विचार,

उस भालू ने जंगल का सबसे सलोना पौधा पाया,

देख उसको हुआ बड़ा अचंभा,

ले आकर पौधे को घर पर लगाया,

पौधा था तो बड़ा खूबसूरत,

पर साथ ना पाया किसी का,

इसलिए था थोड़ा मुरझाया,

भालू ने उसको माथे बिठाया,

हथेली पर रख उस नन्ही सी जान को,

उसी के इर्द-गिर्द एक नई दुनिया को बसाया,

पाकर ऐसा प्यार,

सलोना पौधा फिर से खिलखिलाया,

उसकी खूशबू से पूरा घर जगमगाया,

भालू भी अब खुश हो पाया,

अकेलापन कट गया,

हर कदम पर साथ नन्ही परी को पाया,

दोनों डूबे रहे अपनी दुनिया में ऐसे,

दो ही रह गए थे संसार मे जीव जैसे,

पर एक दिन राजा साहब का बेटा,

जंगल का राजकुमार आया,

उसको वो सलोना पौधा बड़ा ही पसंद आया,

पौधे की खूबियां हज़ार,

राजकुमार ने किया मन ही मन विचार,

ये पौधा अगर मैं अपने घर लगाऊं,

निचोड़ कर सारा रस इसके पत्तों का पी जाऊँ,

दूर ये जाए मेरे सारे रोग,

शायद इसी बहाने हो जाऊं मैं निरोग,

राजकुमार की नजरों से भालू थोड़ा सकपकाया,

पर अपनी अथाह ताकत भी ,

शैतानो पर चला ना पाया,

राजकुमार की चांदी की तलवार की मार,

वो जानवर सह ना पाया,

वही अपनी सलोनी के पास उसका सर लड़खड़ाया,

मरता मरता कुछ आखिरी शब्द वो बुदबुदाया,

प्यार से पकड़ो सलोनी को,

शायद यही वो आखिरी बार चिल्लाया।