कविता, कहानी की बात करते हो,एक बहाना है,
शब्दों की कोई कमी थोड़ी है,
दर्द कम हो अगर तो भर दूं पूरी कविशाला ही,
पर है तो मशीन, कोई अपना थोड़ी है,
भर भर दिन भर कहता रहता हूं कुछ न कुछ खुद से ही,
एक मन ही तो अपना है,ये पराया थोड़ी है,
अरे कहने को शब्द जिह्वा पर भरे पड़े है ज्वालामुखी जैसे,
पर व्यस्त दुनिया में कोई सुनता थोड़ी है,
खुशियों से झोली भरने की बातें सब कर रहे है,
पर पागल, खुश ना हो कोई सच मे भरता थोड़ी है।
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