भीड़ जाती देख चकित हूँ मैं,
देखूँ तो जरा, कौन सा त्योहार आया है,
ये सारे धर्म वाले एक देश की तरह बढ़ रहे,
लगता है शायद चुनाव आया है।
ओह यह चुनावी समर, ये हल्ला गुल्ला,
इस आपा-धापी में देखो प्रजातंत्र का सार,
हम तो सेवक चुनने निकले थे,
शासक बन गए वो, हमारे पास बस चुनने का अधिकार,
आओ चाचा निकलो अपनी झुग्गी-झोपड़ियों से,
आओ टूटी सड़को से, गाँव की पगडंडियों से,
आओ अम्मा तुम भी आओ, राशन की चिंता छोड़,
चावल-दाल आज चुनावी सभा से ले जाओ,
बूढ़े बाबा वहाँ बैठे तुम क्यों खांस रहे हो,
इधर देखो सालो बाद नया भंडार आया है,
जैसे कोई त्योहार आया है,
आओ शायद चुनाव आया है।
भोला, बब्बन तुम भी आओ,
दूसरे शहर से लौट आओ,
कब तक दूर रहोगे घर से,
आओ चाहे मत देकर फिर लौट जाओ,
आओ इस चुनावी दावत में पेट अपने भर लो,
ऊंट देखा जैसे, सारा भोजन आज ही कर लो,
अगले 5 साल भूखे नंगे निकलेंगे भंते,
बच्चो को कहो, अच्छा खाना होता कैसा दर्शन कर लो।
आओ सब सुन तो लो,
जिनके तुम गुलाम बनने वाले हो,
वो आज पैरो में गिरेंगे तुम्हारे,
तुम जिनके पैरो में नेताजी कहकर गिरने वाले हो।
आंख जलाते रहे जिन जहाजों को देखकर,
आओ देखो नेताजी का उड़नखटोला आया है,
आओ पहचानोगे नही तुम आज,
जिसने कल तुमको भगाया था, आज बन पूरा भोला आया है।
आओ देखो नए नए वादों का पूरा बौछार आया है,
पानी मे देखो प्रतिबिम्ब कोई त्योहार आया है,
लगता है शायद चुनाव आया है।
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