मंदिर मस्जिद दोनो में गूंजी,

फिर भी तुझे सुनाई ना दी

उन छोटी बच्चियों की चीत्कार,

कैसे मान लूँ, तू सुनता होगा,

हम सबकी पुकार,


तेरे ही आँगन में

तेरे ही पुजारियों उलेमाओं ने,

कर दिया घिनौना काम,

तू वही मूर्ति बन कैसे करता रहा आराम,


शायद तू भी भगवान नही,

इंसान ही रह गया है,

तभी मस्जिद का अलग,

मंदिर का अलग दर्द तू सह गया है।