एक ग़ज़ल में कहाँ इनका दर्द आएगा,
पर ये कवि अपनी कलम से आवाज़ तो उठाएगा,
सब महबूबा की काली चोटी,
नशीली आंखों पर ही लिखेंगे,
तो गहरी नींद में सो रहे इन कुम्भकर्णो को,
मेरे अलावा और कौन जगायेगा।
सारा नही पर कुछ तो इन पंक्तियों में समायेगा,
जो होंगे इंसान उनको ही सही,
पर ये सबको झकझोर तो जाएगा,
अपना पराया सब अपना सबका दर्द,
अब बस ये अदना कवि आपको सुनाएगा,
लगा के जोर बंद कर ले कान अब,
क्योंकि ये रवि अब बहुत चिल्लायेगा,
तिनका तिनका जोड़ने वालों को लूट तुमने,
जो महल बनाये है, उसका किस्सा बताएगा,
ये तुम्हारे पिछलगू जो बरसे है मुझपे,
उन नींद में चलती लाशों को,
अब ये काला स्याह जगायेगा,
वो भी इंसान उनका भी हक़,
देख ये अदना कवि सबको उनकी औकात बताएगा।
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