ये जो सीने में दर्द सा उठता है,

आत्मा का एक हिस्सा सा खिंचता है,

बाहर से ये भला कहाँ दिखता है,

पर एक एक अंग जैसे पत्थरों में पिसता है।



अब आरजू बस इतनी सी है,

जितनी बची इंसानियत तेरे अंदर,

बस उतनी सी है,

जितनी बची जान मेरे अंदर,

बस उतनी सी है,


तू एक बार फिर से इंसान बन के तो आ,

बचे कितने इंसान मुझे गिन के तो बता,

तू किसकी गुलामी करता है,

है कौन वो, जरा मुझे भी तो दिखा,

अगर नही करता गुलामी,

फिर बता, तू ऐसा क्यों करता है,

इतना खूबसूरत जीवन,

फिर क्यों ये दिल,

अब घुट घुट मरता है,


ये जो सीने में दर्द सा उठता है,

आत्मा का एक हिस्सा सा खिंचता है,

बाहर से ये भला कहाँ दिखता है,

पर एक एक अंग जैसे पत्थरों में पिसता है।