रात को अचानक पवन की नींद खुली, फ़ोन की घंटी बज रही थी, फिर उसका ध्यान घड़ी की ओर गया, रात को 12 बजे कौन हो सकता है, उसने फ़ोन उठाया एक अनजान सा नम्बर था।

तार्किक विद्या में माहिर पवन ने अपना दिमाग दौड़ाया की कौन हो सकता, कोई दोस्त.. पर नंबर मिलता जुलता नही लग रहा, क्या सलोनी... नही नही वो तो अपने घर होगी, पति के पास, वो कैसे इतनी रात को फ़ोन करेगी,

और वो भला मुझे फ़ोन करेगी भी क्यों।

कमरे में एकदम शांति थी, फ़ोन भी कट गया, इससे पहले की पवन कुछ समझ पाता, फोन दुबारा बजा, ऐसा नही की पवन फ़ोन उठाना नही चाहता, पर उठाने से पहले सामने कौन है और उसकी मंशा क्या ये जान लेना उसको अच्छा लगता है।

खैर , उसने फ़ोन उठाया, हेलो! उधर से कोई आवाज़ नही आई, पवन ने फिर दोहराया, "हैलो! कौन", पर कोई आवाज़ नही आई... अब तक पवन का दिमाग पूरा चक्कर लगा चुका था, उसने सांसो की आवाज़ से अंदाजा लगा लिया था कि दूसरी ओर कौन है, "सलोनी !" पवन धीरे से बोला,

"तुमने फिर से पहचान लिया " उधर से आवाज़ आयी।

पवन की रूह काँप गयी, बदन में सिहरन सी दौड़ गयी, धीरे से बुदबुदाया "कैसी हो ?"

"बहुत बुरी"

"इतने दिनों बाद, 6 साल बाद याद आयी ?....

"याद तो हर पल, हर रोज आयी, बस हिम्मत आज हुई"

"हिम्मत, किस चीज की हिम्मत?"

"तुमसे माँफी मांगने की..."

"तो मांग लो...."

"नही...."

"क्यों...."

"मन नही कर रहा..."

"तुम्हारे होंठ नही है ना मेरे पास..."

इतना सुनते ही पवन की आँखों में आंसू आ गए,

वो सहसा यादों के गलियारों में घूमने लगा,

वो जगह सामने आ गयी, जहाँ बैठ के वो सलोनी को बता रहा था, कि वो लोग अपने रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए एक खेल खेलेंगे, अब से वो दोनों कभी भी एक दूसरे से किसी भी बात के लिए माफी मांगने से पहले होंठो की ओर एक किस करेंगे, अगर उसके बाद भी सामने वाले का गुस्सा शांत नही हुआ तो फिर माफी का देखेंगे, एक और किस के बाद।

घूम के समयचक्र वहीं आ खड़ा हुआ था, पवन खड़ा होके खुद को सलोनी के साथ प्यार में डूबा देख रहा था।

अजीब था, पवन खड़े खड़े यही सोच रहा था, प्यार में डूबे ये दोनों, इस प्यार की याद में डूबे वो दोनों, और दोनों के बीच अकेलेपन का जीवन जीता मैं।

बातचीत आगे बढ़ी, पवन ने फ़ोन करने का कारण पूछा।

"कुछ नही, बस याद आ रही थी... ऐसा लग रहा था बस बहुत हो गयी ये नकली जिंदगी, बस कोई अपना चाहिए था, बात करने के लिए, अपनी बात सुनाने के लिए, साथ में हंसने के लिए.." रुंधे गले से सलोनी की आवाज़ रुकने लगी।

"तो छोड़ के क्यों गयी फिर..."

अचानक से शांति हो गयी, सलोनी की धीरे धीरे सुनाई देती सिसकियाँ पवन को झकझोर रही थी।

झकझोरती भी क्यू नही, जिस सलोनी को हंसाने के लिए उसने दिन रात एक कर दिया, उसकी एक मुस्कान के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था,

और सलोनी थी भी ऐसी, जरूरत से ज्यादा चंचल और हँसमुख, बस कम उम्र में जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं के बोझ तले दब सी गयी थी।

लेकिन ये सब पवन से मिलने के पहले तक था, उससे मिलने के बाद तो ये जैसे चिड़ियाँ सी चहकने लगी थी,

कूदने लगी थी, वो 4-5 साल कब गुजर गए किसी को पता ही नही चला, ऐसा लगा जैसे दुनियाँ में कोई दुख है नही।

चुपचाप सी रहने वाली और सबसे चिढ़ने वाली सलोनी अब दिन भर खिलखिलाती थी, हर मुद्दे पर एक टिप्पणी उसकी जरूर होती थी, सामाजिक राजनीतिक हर विषय पर पवन से चर्चा करना जैसे उसकी नित्य क्रिया में शामिल हो गया था।

"मैं कहाँ गयी, मुझे तो ले जाया गया, मेरे लिए तो जीवन वही रुक गया था।"

"हाँ",

बातें तो बहुत सारी करनी थी दोनो को, पवन तो हर रोज लेटकर दीवार की ओर सलोनी का प्रिय गोल वाला तकिया रखकर घंटो बातें भी करता था, पर ये क्या आज दोनो ही चुप है, बस एक दूसरे को सुनना चाहते है, होंठो पर मुस्कान भी है, आंखों में नमी भी है, और पैर जमीन पर पड़ नही रहे, चेहरे पर एक उत्सुकता साफ दिखती है,

शायद इसी को प्रेम कहते है, वो प्रेम जो कभी मरता नही, कभी रुकता नही, कितनी भी दूरी हो, कितना भी समय बीत जाएं पर प्रेम रत्ती भर भी कम नही हुआ है, लेकिन परिस्थिति जरूर बदल गयी है।

दोनो एक दूसरे के अपने प्रेम का इजहार करते कभी थकते नही थे, पर आज इतने दिनों बाद भी अपनी भावनाएं छुपाएँ बैठे है, इसे इस समाज का जहर न कहे तो और क्या कहें?

"बस जानना था तुम ठीक हो या नही, क्या कर रहे हो, कोई लड़की-वड़की मिली कि नही" सलोनी ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की।

"जरूरत ही नही पड़ी, अकेले रहने की आदत सी पड़ गयी"

"अबे जाओ, बड़ी बड़ी बातें करना तो कोई तुमसे सीखे" सलोनी अब अपने पुराने तंज कसने वाले अंदाज में आ गयी।

"लंबी फेंकते रहते हो दिन भर, कोशिश तो खूब की होगी पर कोई पटी ही नही होगी तुमसे ,शक्ल ही गंदी है तुम्हारी"

"हाँ, बिल्कुल तुम्हारी तरह, तभी तो तुम थी मेरे साथ"

"अबे, मैं तो गलती से फँस गयी थी...बस पता नही कैसे छूट गयी, फंसे ही रहना था.... " बोलते बोलते सलोनी का गला रुंध सा गया।

"कोई भी लड़की तुम्हे पाकर खुद को खुशकिस्मत समझेगी, मेरी ही किस्मत खराब है, काश कोई मुझसे मेरी भी इच्छा पूछ लेता... काश की घर वालों अच्छी सरकारी नौकरी की जगह अच्छा लड़का ढूंढा होता।"

बोलते बोलते सलोनी शांत हो गयी।

"तुम बताओ, कि तुम मुझसे मिलने कब आओगे"

"मिलने कब आऊँगा, आना चाहता हूँ, मिलने कब, कब मिलने...." पवन की लड़खड़ाती आवाज़ में अचानक दर्द भर आया।

"तुमने वादा किया था... की इस जहान से दूर सितारों में मिलेंगे, वहाँ हमे अलग करने वाला कोई नही होगा।"

"मिलने, कब , कैसे, मैं कुछ नही होने दूंगा, आऊंगा, जल्दी ही.... जल्दी ही आऊँगा.... लड़ रहा हूँ"

"कब तक इंतज़ार करू मैं.... और कितनी देर.... कब तक ...."

सलोनी की आवाज़ पवन के सर में गूंजने लगी, उसका सर फटा जा रहा था.... वही आवाज़ बार बार गूंज रही थी.... "कब तक पवन, कब तक, कब तक इंतज़ार करू मैं तुम्हारा, तुम्हारे इंसाफ का.... कब तक , कब आओगे तुम...."

पवन का सर फटने लगा, और अचानक से उसकी आंख खुल गयी, सुबह के 10 बज रहे थे... फ़ोन वही पड़ा था, साइलेंट पर।

पवन जल्दी से उठा, तैयार हुआ, और फाइलों का पूरा बंडल लेके निकल गया, अपनी सलोनी को इंसाफ दिलाने, फिर दौड़कर वापस आया, कानून वाली मोटी किताब भूल गया था, जिसपर लिखा था 304 - बी।

- रवि वर्मा

@ra1vi2