इतने ज़ख्म सहे है मेरे इस दिल ने
के
अब कोई दर्द मुझे दर्द नही लगता
एहसास ही नहीं रहा अब
मेरे इस
बे-जान जिस्म में
न धड़कने सुनाई देती है
न सुनाई देती है कोई आवाज़
सुनाई देती है
तो बस एक तेरी ही आवाज़
जो
हर पल मेरी यादों में होती है
वो
तड़पाती है मुझे
रुलाती है मुझे
बिखेर कर रख देती है मुझे
जैसे बिखरे मोतीयों की माला कोई
फ़िर भी
एक वही ब'आत ही झहेन में मेरे रहती है
की
तू पहली मुहब्बत है मेरी
-रवि नकुम (ख़ामोशी)


