माना साधन नहीं थे मेरे पास
था सेना का भी अभाव l
कैसे हटती पीछे,
लड़ना ही था मेरा स्वभाव l
मै जलता दीप थी
क्यों न उजाला करूँ l
था जीवन प्यारा, पर
आजादी के लिए क्यों न मरूं l
थी मै अबला किन्तु बन सबला
हर राह पर काँटों को स्वीकारा l
चली आयी निडर हो
बड़े जोश से दुश्मन को ललकारा l
वीरों की नियति पर चल
सारा रक्त बहा गयी l
हो देश सवतंत्र
सबको ये पाठ सीखा गयी l


