न धुआं देखा है न रौशनी कभी देखी

कैसे रिंद हो जिसनें मयकशी नहीं देखी

ये कैसा इल्म है जो दायरे में ही रखे

किताबी लकीरों ने कभी जिंदगी नहीं देखी


जिसका दीवाना कहलाने का तुझे गुरुर है

जिसकी गुस्ताखी मेंं तुझे कुछ गवारा नहीं

मुझे खुद सा मानता है वो यार मेरा

उसने मुझमें कभी कोई कमीं नहीं देखी


तेरे खयाल, सोहबत और कमी

के बिना धडकनेंं भी बजती नहीं

जाने क्या खलल है मेरी निगाहों मेंं

हर बुत मेंं तेरी रौशनी नहीं देखी