**"मै हूँ " प्रकृति"**

  कुदरत की बनायी इस सृष्टी का,सुंदर सा मैं एक सृजन हूँ,,


धरती पर पल रहे जीवों का,जीने का मैं एक आधार हूँ,,

मुझसे ही तो है धरती अंबर,मुझसे ही बना ये संसार है,,

मुझसे ही तो है पानी और आग,मुझसे ही पवन बयार है,

जिनसे मिले तुम्हें खुल कर सांस,कुदरत का आविष्कार हूँ,,

   

*"हे मानव

  तुम तो अपनी स्वार्थ की खातिर,उजाड़ दिये हो बाग तलाब,

*प्रकृति* की सुंदरता छीन कर,सजा बैठे हो अपना घर बार,,

थोड़े से पैसो की खातिर,करते हो तुम तो मौत का व्यापार,,

कहाँ से अब दूँ शुध्द हवा,,जिनसे मिले तुम्हें खुल कर सांस,


बाग उजाड़े वन उजाड़े,एक भी पेड़ ना तुमने लगाये,

जब कुदरत की मार पड़ी,तो हाय,हाय कर तुम चिल्लाए,,

अब तो जागो आँख को खोलो,*प्रकृति* से तुम यूँ ना खेलो,

एक उजाड़ो तो चार लगाओ,यही कसम सब मिलकर खाओ,,


क्या तुम्हें हुआ थोड़ा ज्ञात,प्रकृति के बिन नहीं कुछ औकात,,

सबसे बड़ा धरोहर अपना,जीवन का है ये सौगात,,

कुदरत की इस संरचना का,अब रखना है मिलकर ख्याल,,


                        ......रति सिंह(रिंकी)