
देश के दिल को इस क़दर ख़ा रही, जैसे राजनीति दावत मना रही..
भाषाओं के भी धर्म बता रही, देख़ो राजनीति बँटवारे करवा रही..
आँख़ों पर कंबल ढके सो रही, कानों के पट बंद किये बोल रही,
ये राजनीति अँधी – बहरी हो गई..
राष्ट्र का सौदा कर इसे आपसी समझौता बता रही, ये राजनीति फ़ायदा उठा रही..
नेता से नेता पर उँगली उठवा रही, देखो ये तो मज़े उडा रही..
खिला खिला कर
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