वो सफ़ैद अंधेरों के परिंदे
हैं जो थोड़े हल्के उजले,
उड़ने का तो मन भी करता है
पर क्यूं थोडे सहमे सहमे
सदियों से है पंख न खोला
उड़ने को अब है बेकल सारे…
“rashid ali ghazipuri”
For My Books:-
https://www.amazon.in/Rashid-Ali-Ghazipuri/e/B09PLL8ZCB


वो सफ़ैद अंधेरों के परिंदे
हैं जो थोड़े हल्के उजले,
उड़ने का तो मन भी करता है
पर क्यूं थोडे सहमे सहमे
सदियों से है पंख न खोला
उड़ने को अब है बेकल सारे…
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