वो सफ़ैद अंधेरों के परिंदे

हैं जो थोड़े हल्के उजले,

उड़ने का तो मन भी करता है

पर क्यूं थोडे सहमे सहमे

सदियों से है पंख न खोला

उड़ने को अब है बेकल सारे…

“rashid ali ghazipuri”



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