सियाह रूहें रौशनी की तलब लिए फिरती हैं,बस यूँ ही ये नहीं फिरती हैंहैं लिपटी स्याह से भी स्याह जिस्मों की परतों में,निजात की आस लिए उन आसमा को तकती हैं…" rashid ali ghazipuri "For My Books:-
सियाह रूहें रौशनी की तलब लिए फिरती हैं,बस यूँ ही ये नहीं फिरती हैंहैं लिपटी स्याह से भी स्याह जिस्मों की परतों में,निजात की आस लिए उन आसमा को तकती हैं…" rashid ali ghazipuri "
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