कौन है जो जला बैठा खुद अपनी ही उँगलियों को
हसरतों की आग में खुद की ज़मी को,
है हमारी फितरत ही बेसब्र बन जाने की
वरना ज़रूरत क्या थी डूब जाने की,
वो कनारे अब भी हैं उथले से ही
फिर सबब क्या हुई उभार ना आने की...
-Rashid Ali Ghazipuri

कौन है जो जला बैठा खुद अपनी ही उँगलियों को
हसरतों की आग में खुद की ज़मी को,
है हमारी फितरत ही बेसब्र बन जाने की
वरना ज़रूरत क्या थी डूब जाने की,
वो कनारे अब भी हैं उथले से ही
फिर सबब क्या हुई उभार ना आने की...
-Rashid Ali Ghazipuri