माँ
माँ सागर है प्रेम का, करुणा का,
ईमान का,बलिदान का।
माँ स्त्रोत है मुस्कान का,
परिणाम है खुद भगवान का।
माँ ग्रंथ भी है,माँ पुराण भी,
माँ धर्म भी है,माँ स्वयं जात भी।
माँ ही मंदिर,माँ ही मस्ज़िद,
माँ ही गिरिजा,माँ गुरु का द्वार भी।
माँ वेग भी है,प्रकाश भी,
माँ ताप भी है और गांभीर्य भी।
माँ वात्सल्य है या वीर रस,
माँ हास्य रस या शांत रस?
माँ शायद अदभुद रस है!
जो भी है वे 'मेरी माँ' हैं।


