काग़ज़ पे लकीरें वो लगाता चला गया
मुझको बनाता और मिटाता चला गया
कुछ नक्स उभरे कुछ गुम हो गये
हर नक्स के निशाँ वो छुपाता चला गया
काग़ज़ पे लकीरें वो लगाता चला गया
मुझको बनाता और मिटाता चला गया
जिस्म के हर हिस्से पे लिखी कई
ताबीरे हर ताबीर पे निशानी वो लगाता चला गया
काग़ज़ पे ...........
निगाहों से बयां न हो जाये
दिल की हरेक बात निगाहों को मेरी सुरमे से सजाता चला गया
काग़ज़ पे .........
तन को मेरे ढक दिया है
गहनों के अंबार से ख़ुश हूँ
हर तरह से जताता चला गया
काग़ज़ पे .......
बेपरदा न हो जाये
उसकी ये सारी रंजिशें मुझे वो परदानशीं कहलाता चला गया
काग़ज़ पे.......
लकीरें वो लगाता चला गया
मुझको बनाता और मिटाता चला गया