यहां इतनी क्यों खामोशी है ऐसे लगता है जैसे बाग में चिड़ियों का न होना, नदी का रास्ता रोकने पर उसका खफा होना।ये मंज़र ऐसे लगता हैं जैसे बारिश का खत्म होने पर आसमान का बादल से खफा होना। इतनी खामोशी को देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे जंगल में मानव का अमानवीय कृत्यों के कारण पंक्षियो का खफा होना। जैसे चलती भीड़ में तन्हाई का यूं पास आना। यहां इतनी खामोशी को देखकर ऐसे लगता है जैसे समुन्द्र की गड़गड़ाहट को जैसे हवा का झोंका होना। यूं लगता है जैसे चमक- दमक की नगरी में जैसे अंधेरा सा होना। इतनी संपन्नता को देखकर ऐसे लगता है जैसे मानवीय गुरबत का ढेर होना। ऐसा महसूस होता है जैसे साथ है पास है फिर भी अकेला सा होना। इतनी हंसी-खुशी को देखकर ऐसे लगता है जैसे दिखावटी सा होना। यहां इतनी खामोशी क्यों है????
