हवा का झोंका गुजरा इस गली से उसके हो गए

जहन मे कुछ बैचेनी सी है होश मे बेहोश हो गए


ज़ुल्मत के आइने को वो लोग हवा दे गए

जो लोग चश्म-ए-मस्त शबाब के आइने मे उतर गए


आख़िरश धूल इस ओर से लाये थे उस ओर दे गए

चराग-ए-राह दोजख के समा तक करते रह गए


याद-ए-माजी ताज़ा मन मे करते गए

जर्द-ए हवा लाए थे सहल हो कर चले गए


दीद को अरसा हो गया हमी से हमी का

है उम्मीद हफ़िज़ा से कि दो-दो कर ले


इबादत जिस गली से आए तेरी उस को जन्नत कर गए

इल्मी शौक पाले हो जिन्होंने उनके लिए क्या उल्फत क्या अफ़साने।।


✍️✍️Ranjeet ©