यक़ीन


दिन खाली-खाली और

दिल भरा सा लगता है,

जाने क्या बात है!

जी डरा सा लगता है।


ग़म-ए-हिज़्र जो तूने

दिया था मुझको कभी।

ज़ेहन-ओ-दिल में वो

अबभी हरा सा लगता है।


कर्ज़ कुछ भी नहीं

उसका बाकी मुझपर,

बोझ सीने पे फिर क्यूँ

धरा सा लगता है?


नज़र दुनियाँ को मैं

ज़िन्दा आता हूँ मगर,

बशर मेरे अंदर का

मरा सा लगता है।


तू बेवफ़ा मुझसे

हो गया था "मुनहसिर"

तेरे आने का यक़ीन फिर भी

ज़रा सा लगता है।

रंजीत"मुनहसिर"।