
यक़ीन
दिन खाली-खाली और
दिल भरा सा लगता है,
जाने क्या बात है!
जी डरा सा लगता है।
ग़म-ए-हिज़्र जो तूने
दिया था मुझको कभी।
ज़ेहन-ओ-दिल में वो
अबभी हरा सा लगता है।
कर्ज़ कुछ भी नहीं
उ
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यक़ीन
दिन खाली-खाली और
दिल भरा सा लगता है,
जाने क्या बात है!
जी डरा सा लगता है।
ग़म-ए-हिज़्र जो तूने
दिया था मुझको कभी।
ज़ेहन-ओ-दिल में वो
अबभी हरा सा लगता है।
कर्ज़ कुछ भी नहीं
उ