"सबब"
वही पूछता है मुझसे,मेरे ग़म का सबब
ज़ख्म जिसने मुझे बे-शुमार दिया।
रखकर लबों को अपने लबों पर मेरे सीने में खंज़र उतार दिया।
एक लम्हें की दीद मांगी थी, मगर
सदियों का मुझे उसने इंतज़ार दिया।
मेरा ज़िक्र भी अब उसको गवारा नहीं,
उम्र सोहबत में मेरी जिसने गुज़ार दिया।
मेरे अश्क भी अब उसको ज़हर लगते हैं,
सींचकर अपने लहू से जिसे गुलज़ार दिया।
अहद-ए-वफ़ा पर जिसके हम यकीं करते रहे,
दग़ा मुझको उस बे-वफ़ा ने सर-ए-बाज़ार दिया।
उसकी बेरुख़ी ही बहुत थी मेरे मरने के लिए,
बद-दुआ फिर भी मुझे उसने हज़ार दिया।
थे "मुनहसिर" जिसपर हम अपनी साँसों के लिए,
जहाँ भर का मुझे उसने आज़ार दिया।
रंजीत"मुनहसिर"
09/12/2020

