ज़िस्म फ़क़त एक ज़रिया है,इश्क़ तो रूह का नाता है।हो जिसपे रहम उस रब की,बस वो ही इसको पाता है।रंजीत रंजन"मुनहसिर"।
ज़िस्म फ़क़त एक ज़रिया है,इश्क़ तो रूह का नाता है।हो जिसपे रहम उस रब की,बस वो ही इसको पाता है।
रंजीत रंजन"मुनहसिर"।